मुरादाबाद। थैलेसीमिया मेजर से जूझ रहे बच्चों के लिए थैलेसीमिया स्टेम सेल ट्रांसप्लांट नई उम्मीद बनकर सामने आया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट वर्तमान में इस गंभीर जेनेटिक बीमारी का सबसे प्रभावी और स्थायी इलाज माना जा रहा है।
इससे मरीजों को बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन और दवाओं पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
क्या है थैलेसीमिया मेजर?
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज के हीमेटो-ऑन्कोलॉजी एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट विभाग के सीनियर डायरेक्टर डॉ. सत्येन्द्र कटेवा ने बताया कि थैलेसीमिया मेजर में शरीर सामान्य रेड ब्लड सेल्स नहीं बना पाता।
इसके कारण हीमोग्लोबिन तेजी से कम होने लगता है और मरीज गंभीर एनीमिया का शिकार हो जाता है। उन्होंने बताया कि ऐसे मरीजों को नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है।
हालांकि इससे मरीज की स्थिति नियंत्रित रहती है, लेकिन बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं होती।
बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन से बढ़ता है खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार लगातार ब्लड ट्रांसफ्यूजन कराने से शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है।
इसका असर हृदय, लिवर और हार्मोन सिस्टम पर पड़ सकता है।
कई मरीजों में आगे चलकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं भी सामने आती हैं।
इसी वजह से थैलेसीमिया इलाज में अब स्टेम सेल ट्रांसप्लांट को बेहतर विकल्प माना जा रहा है।
कैसे होता है स्टेम सेल ट्रांसप्लांट?
डॉ. कटेवा ने बताया कि हेमाटोपोएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट यानी बोन मैरो ट्रांसप्लांट में मरीज के खराब बोन मैरो को स्वस्थ डोनर के स्टेम सेल्स से बदला जाता है।
ट्रांसप्लांट सफल होने के बाद शरीर सामान्य रक्त कोशिकाएं बनाना शुरू कर देता है।
इससे मरीज लगभग सामान्य जीवन जी सकता है।
थैलेसीमिया स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की सफलता दर कई मामलों में 90 प्रतिशत से अधिक देखी गई है।
सही डोनर मिलने पर बढ़ जाती है सफलता
विशेषज्ञों ने बताया कि यदि भाई या बहन में पूरी तरह एचएलए मैचिंग डोनर मिल जाए तो बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सफलता काफी बढ़ जाती है।
अगर सिबलिंग डोनर उपलब्ध न हो तो मैच्ड अनरिलेटेड डोनर (MUD) और हैप्लोआइडेंटिकल डोनर जैसे विकल्पों का भी इस्तेमाल किया जाता है।
कम उम्र में किया गया थैलेसीमिया स्टेम सेल ट्रांसप्लांट अधिक सफल माना जाता है।
इलाज में जोखिम भी मौजूद
डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि स्टेम सेल ट्रांसप्लांट पूरी तरह जोखिम मुक्त प्रक्रिया नहीं है।
कुछ मरीजों में संक्रमण, ट्रांसप्लांट रिजेक्शन और ग्राफ्ट-वर्सेस-होस्ट डिजीज जैसी जटिलताएं हो सकती हैं।
इसलिए विशेषज्ञों ने सलाह दी कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट केवल अनुभवी डॉक्टरों और विशेषज्ञ अस्पतालों में ही कराया जाना चाहिए।
