उत्तर प्रदेश में SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। आगामी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मतदाता सूची का मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बनता नजर आ रहा है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यूपी में SIR को लेकर भाजपा पर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा उठाकर राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है।
रामलीला मैदान की रैली में अखिलेश यादव ने उठाया SIR का मुद्दा
1 नवंबर 2026 को दिल्ली के रामलीला मैदान में INDIA गठबंधन की ‘चलो दिल्ली’ रैली आयोजित हुई।
इसमें अखिलेश यादव भी शामिल हुए। रैली के दौरान उन्होंने मतदाता सूची में नाम कटने का मुद्दा उठाया।
अखिलेश यादव ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में करीब 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने की बात सामने आई है।
उन्होंने इस आंकड़े को लेकर सवाल उठाए और कहा कि इसका असर हर विधानसभा क्षेत्र में दिखाई देता है।
उन्होंने इसे लोकतंत्र और मतदान के अधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। साथ ही चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की जरूरत पर जोर दिया।
आधार कार्ड से मतदाता सूची जोड़ने की मांग
अखिलेश यादव पहले भी मतदाता सूची को आधार कार्ड से जोड़ने की मांग उठा चुके हैं।
उन्होंने मतदान केंद्रों पर बायोमेट्रिक सत्यापन की व्यवस्था लागू करने का सुझाव भी दिया था।
उनका कहना है कि इससे फर्जी और दोहरे मतदाताओं की पहचान करने में मदद मिल सकती है।
साथ ही पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटने की आशंका भी कम हो सकती है।
2027 विधानसभा चुनाव से पहले SIR पर बढ़ी राजनीतिक बहस
उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में SIR का मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
समाजवादी पार्टी इस मुद्दे के जरिए भाजपा और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है।
वहीं भाजपा की ओर से मतदाता सूची में पात्र लोगों के नाम जुड़वाने के लिए बूथ स्तर पर अभियान चलाने की बात कही गई है।
चुनाव आयोग के अनुसार, SIR का उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, दोहरे और अन्य अपात्र मतदाता प्रविष्टियों की पहचान करना है।
पात्र मतदाता निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना नाम जुड़वा सकते हैं।
यूपी की राजनीति में SIR कितना अहम होगा?
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले SIR और मतदाता सूची का मुद्दा राजनीतिक चर्चा में बना हुआ है।
अखिलेश यादव की सक्रियता से यह मुद्दा विपक्ष की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।
अब आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मतदाता सूची से जुड़े सवालों पर राजनीतिक दल
और चुनाव आयोग क्या रुख अपनाते हैं।
